पैशन बदलने वाले संस्थान
लगभग सभी देशो में बच्चों के शिक्षा के शुरुवात के लिए अनुकूल समय 3 वर्ष है।प्रारम्भिक शिक्षा के शरू होते ही उन्हें अक्षर ज्ञान,अच्छे वातावरण व सभी आदर्श सिखलाये जाने लगते हैं।ऐसा शुरुवात लगभग विश्व के सभी देशो में एक सभ्यता है।बच्चे एक ऐसा नीव हैं जिन्हें मजबूती दी जाने के लिए लगभग हर सम्भव प्रयास माता-पिता और शिक्षकों द्वारा की जाती है।हमारे भारतीय मध्यम वर्गीय समाज में बच्चों के पैदा होते ही उन्का भविष्य तय हो जाता है की उन्हें क्या बनना है।माता-पिता अपने सपनो को जो कभी पूरा न कर सके वो अपने बच्चों से पूरा करवाते है और समाज में सीना चौड़ी करके घूमते फिरते है।इसी कर्म में अगर बचा असफल हो जाता है तो उन्हें कोसा जाता है लेकिन कभी उनसे राय नही ली जाती की उन्हें क्या करना है।
आज कल एक सबसे प्रसिध्द शब्द ब्रेन वॉश सुनने को मिल रहा है।छोटे बच्चों को या बड़े लोगो को भी इसके द्वारा आसानी से किसी बात के लिए मना लिया जाता है।कुछ उदाहरण कुछ,मोटिवेशनल बातें,कुछ झूठ सबको मिलाकर अगले के दिमाग को,सोच को बहुत आसानी से बदल दिया जाता है।
भविष्य में कुछ ऐसे संस्थान भी खुलने के उम्मीद हैं की जहाँ आप अपने हिसाब से अपने बच्चों के सपने बदल सकते हैं?जी हाँ,बिकुल सही पढा आपने।
कल्पना कीजिये की आपका छोटा सा बच्चा है और वो थोड़ी बहुत कहानियां और टीवी देखकर अपने मन में एक अच्छा गायक (कल्पना मात्र) बनने के सपने देखता है,लगभग उसने तय कर लिया है की उसे गायक ही बनना है।वह अच्छा खासा गा भी लेता है ये बात उसके परिवार में सबको पता है सबको ये भी अच्छे से पता है की अगर वह गायन के क्षेत्र में जाएगा तो (शायद) वो अच्छा नाम व पैसा दोनों कमा सकता है लेकिन उसके माता-पिता को डर है की इस चक्कर में वह अपना भविष्य खराब ना कर दे।आखिर अपने अगल-बगल,अपने समाज रिस्तेदारो से वो क्या बोलेंगे की उनका लड़का गायक है थोड़े बहुत पैसे कम लेता है,नही नही ऐसा कभी नहीं हो सकता।उसके माता पिता उसके पैदा होते ही उसे डॉक्टर बनाने की सोच लिए थे। माता पिता अपने एकलौते बच्चे के लिए दुःखी रहने लगे।
अन्ततःवे एक ऐसे संस्थान में गए जहाँ कुछ ही दिनों में उनके बच्चों की सोच उनका पैशन एकदम बदल दिया जाता था।उस संस्थानन में कुछ दिनों तक बच्चे को सबसे दूर रखा जाता था,एकांत में।मान लीजिये की बच्चे को डॉक्टर बनाने का ठेका लिया गया की अबसे ये डॉक्टर ही बनने की ज़िद्द करेगा।उसे बाकी सारी बातो को ,बाकी सारे कामो को या तो थोड़ी सच्चाई थोड़ी झूठ,सब मिलाकर उन्हें थोड़े दिन तक डोज़ दिया जाता था उन्हें रटा दिया जाता था की उन्हें डॉक्टर ही बनना है।बच्चे को यह तक सिखा दिया जाता था की उसे डॉक्टर से सम्बन्धित चीजे या बाते ही पसन्द आने लगती।अब उस बच्चें की पूर्ण रूप से पैशन बदल चुका था और सच मानिए ऐसा नही की वह बाद में अच्छा परफॉर्म नही पाएगा,वह बाद में एक अच्छा डॉक्टर बनेगा लेकिन प्राकृतिक नही जो उसे बनने की क्षमता ईश्वर ने या प्रकृति ने दिया था क्या वह कभी वैसा कर पाएगा,बिल्कुल नही।
आजकल ऐसे बहुत सारे संस्थान खुलने के कगार पर है और माँ-बाप भी अपने ईगो के चक्कर में बच्चों को एक अलग ही दिशा दे रहे हैं।बहुत कम दिन में ही ऐसा होगा की ऐसे बहुत सारे ऐसे संस्थान खुलेंगे लगभग हर छोटे बड़े शहरों में।ऐसे संस्थान ये कह सकते है की कॉउंसलिंग का ही बदल हुआ रूप होगा।इससे माँ-बाप तो संतुष्ट हो जाएंगे लेकिन उस छोटे से बच्चे का क्या जो वीरता की कहानियां किताबो में पढा करता था,उन वीरो के तरह बनना चाहता था,खुल के गाना चाहता था,खुल के नाचना चाहता था।जब वह अपने पैशन के हिसाब से जीता तो उसका काम काम नही लगता वो उसे बड़े आराम से निभाता,खुश रहता,संतुष्ट रहता।
हर माता पिता को ये सोचना चाहिए की हर एक मनुष्य में ईश्वर ने एक गुण जरूर दिया है उस गुण की पहचान करने में माँ-बाप को बच्चों की मदद करनी चाहिए जिससे उनका बच्चा जरूर ही नाम कमाएगा और माँ-बाप का भी नाम होगा।अपनी नाकामी अपने बच्चों पर कभी ना थोपे वरना वो खुद को ही ज़िन्दगी भर नही खोज पाएगा,दुनिया बहुत बड़ी है जैसा की अभी भी 1 %से भी कम लोग जो अपने हुनर को पहचान के जीते है और आज शिखर पर हैं।आज उनके पास सबकुछ है।अपने बच्चों के हूनर से कभी खिलवाड़ ना करे।
-कुन्दन चौबे
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